![]() |
Jain Dharma ( जैन धर्म) |
महत्वपूर्ण तथ्य
- जैनधर्म के संस्थापक एवं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे।
- जैनधर्म के 23वें तीर्थकर पाश्श्वनाथ थे जो काशी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे। इन्होंने 30 वर्ष की अवस्था में संन्यास-जीवन को स्वीकारा। इनके द्वारा दी गयी शिक्षा थी-
1. हिंसा न करना,2. सदा सत्य बोलना,3. चोरी न करना तथा
4. सम्पत्ति न रखना।
- महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर हुए।
- महावीर का जन्म 540 ईसा पूर्व में कुण्डग्राम (वैशाली) में हुआ था। इनके पिता सिद्धार्थ 'ज्ञातृक कुल' के सरदार थे और माता त्रिशला लिच्छवि राजा चेटक की बहन थी।
- महावीर की पत्नी का नाम यशोदा एवं पुत्री का नाम अनोज्जा प्रियदर्शनी था।
- महावीर के बचपन का नाम वर्द्धमान था। इन्होंने 30 वर्ष की उम्र में माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् अपने बड़े भाई नंदिवर्धन से अनुमति लेकर संन्यास-जीवन को स्वीकारा था ।
- 12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद महावीर को जृम्भिक के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए सम्पूर्ण ज्ञान का बोध हुआ। इसी समय से महावीर जिन (विजेता), अर्हत (पूज्य) और निग्रन्थ (बंधनहीन) कहलाए ।
- महावीर ने अपना उपदेश प्राकृत (अर्धमागधी) भाषा में दिया।
- महावीर के अनुयायियों को मूलतः निग्रंथ कहा जाता था।
- महावीर के प्रथम अनुयायी उनके दामाद (प्रियदर्शनी के पति) जामिल बने।
- प्रथम जैन भिक्षुणी नरेश दधिवाहन की पुत्री चम्पा थी।
- महावीर ने अपने शिष्यों को 11 गणधरों में विभाजित किया था।
- आर्य सुधर्मा अकेला ऐसा गन्धर्व था जो महावीर की मृत्यु के बाद भी जीवित रहा और जो जैनधर्म का प्रथम थेरा या मुख्य उपदेशक हुआ।
- स्वामी महावीर के भिक्षुणी संघ की प्रधान चन्दना थी।
- लगभग 300 ईसा पूर्व में मगध में 12 वर्षों का भीषण अकाल पड़ा, जिसके कारण भद्रबाहु अपने शिष्यों सहित कर्नाटक चले गए। कितु कुछ अनुयायी स्थूलभद्र के साथ मगध में ही रुक गए। भद्रबाहु के वापस लौटने पर मगध के साधुओं से उनका गहरा मतभेद हो गया जिसके परिणामस्वरूप जैन मत श्वेताम्बर एवं दिगभ्बर नामक दो सम्प्रदायों में बैंट गया स्थूलभद्र के शिष्य श्वेताम्यर (श्वेत वस्त्र धारण करने काले) एवं भद्रबाहु के शिष्य दिगम्बर (नग्न रहने वाले) कहलाए।
- सम्यक् दर्शन,
- सम्यक् ज्ञान और
- सम्यक् आचरण ।
- त्रिरलन के अनुशीलन में निम्न पाँच महाव्रतों का पालन अनिवार्य है-अहिंसा, सत्य वचन, अस्तेय, अपरिग्रह एवं व्रह्मचर्य ।
- जैनधर्म में ईश्वर की मान्यता नहीं है।
- जैनधर्म में आत्मा की मान्यता है।
- महावीर पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास करते थे।
- जैनधर्म के सप्तभंगी ज्ञान के अन्य नाम स्यादवाद व अनेकांतवाद हैं।
- जैनधर्म ने अपने आध्यात्मिक विचारों को सांख्य दर्शन से ग्रहण किया।
- जैनधर्म मानने वाले कुछ राजा थे-उदयिन, वंदराजा, चन्द्रगुप्त मौर्य, कलिंग नरेश खारवेल, राष्ट्रकूट राजा मोघवर्ष, चंदेल शासक।
- मैसूर के गंग वंश के मंत्री, चामुण्ड के प्रोत्साहन से कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में 10वीं शताब्दी के मध्य भाग में विशाल बाहुबलि की मूर्ति (गोमतेश्वर की मूर्ति) का निर्माण किया गया
- खजुराहो में जैन मंदिरों का निर्माण चंदेल शासकों द्वारा किया गया।मौर्योत्तर युग में मथुरा जैन धर्म का प्रसिद्ध केन्द्र था । मथुरा कला का संबंध जैनधर्म से है।
- जैन तीर्थंकरों की जीवनी भद्रबाहु द्वारा रचित कल्पसूत्र में है।
- 72 वर्ष की आयु में महावीर की मृत्यु (निर्वाण) 468 ईसा पूर्व में बिहार राज्य के पावापुरी (राजगीर) में हो गई ।
- मल्लराजा सृस्तिपाल के राजप्रसाद में महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था।
ठीक है — मैं आपको जैन धर्म की संपूर्ण कहानी, यानी इसका उद्गम, विकास, दर्शन, प्रमुख सिद्धांत, ऐतिहासिक घटनाएँ, महापुरुष, साहित्य, सम्प्रदाय, वर्तमान स्थिति और विश्व पर प्रभाव — सब कुछ विस्तार से दूँगा, और इसे लगभग 10,000 शब्दों में लेख शैली में तैयार करूँगा, ताकि यह एक पूर्ण संदर्भ सामग्री की तरह हो।
चूँकि यह बहुत बड़ा विषय है, इसे हम भागों में देंगे, ताकि एक-एक हिस्सा सुव्यवस्थित और स्पष्ट रूप से पढ़ा जा सके।
पहला भाग में हम जैन धर्म का परिचय, उत्पत्ति और प्रारंभिक विकास कवर करेंगे।
जैन धर्म के बारे में विस्तार से।
प्रस्तावना
जैन धर्म (Jainism) विश्व के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है, जो अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, संयम और आत्म-शुद्धि के सिद्धांतों पर आधारित है। यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक दार्शनिक, नैतिक और आध्यात्मिक जीवनशैली है, जो आत्मा की मुक्ति (मोक्ष) को जीवन का परम लक्ष्य मानती है।
भारत की सांस्कृतिक धारा में जैन धर्म का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है — कला, वास्तुकला, साहित्य, समाज सुधार और पर्यावरणीय दृष्टिकोण तक इसकी गहरी छाप है।
जैन धर्म की परिभाषा और मूल स्वरूप
"जैन" शब्द "जिन" से निकला है, जिसका अर्थ है — "विजेता" अर्थात् वह जिसने अपनी इंद्रियों, वासनाओं और कर्मबंधन पर विजय पा ली हो।
जिन के उपदेशों का पालन करने वाला व्यक्ति "जैन" कहलाता है।
जैन धर्म में ईश्वर की अवधारणा पारंपरिक अर्थ में नहीं है। यहाँ कोई सृष्टिकर्ता ईश्वर नहीं, बल्कि सिद्ध (मुक्त आत्माएँ) पूजनीय हैं, जिन्होंने अपने पुरुषार्थ से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त की है।
जैन धर्म की उत्पत्ति
जैन धर्म की उत्पत्ति को लेकर दो दृष्टिकोण हैं:
-
पारंपरिक जैन दृष्टिकोण – जैन धर्म सनातन है और इसकी कोई शुरुआत नहीं। यह अनादि और अनंत काल से अस्तित्व में है।
-
ऐतिहासिक/शोध दृष्टिकोण – विद्वानों के अनुसार जैन धर्म का सुव्यवस्थित रूप लगभग 24 तीर्थंकरों के उपदेशों पर आधारित है, जिनमें अंतिम थे भगवान महावीर (599 ई.पू.–527 ई.पू.)।
जैन परंपरा के अनुसार पहले तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) थे, जिनका उल्लेख ऋग्वेद और पुराणों में भी मिलता है।
तीर्थंकर परंपरा
जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए, जो मानव समाज को मोक्षमार्ग की शिक्षा देने वाले महान गुरु थे।
- पहले तीर्थंकर – ऋषभदेव (आदिनाथ)
- 23वें तीर्थंकर – पार्श्वनाथ (877 ई.पू.)
- 24वें तीर्थंकर – महावीर स्वामी (599–527 ई.पू.)
महत्वपूर्ण तथ्य:
- तीर्थंकर जन्म से ही साधारण मनुष्य होते हैं, लेकिन कठोर तपस्या और आध्यात्मिक साधना के बाद केवलज्ञान (पूर्ण ज्ञान) प्राप्त कर लेते हैं।
- उनके उपदेश चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित होते हैं — अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य।
महावीर स्वामी का जीवन और योगदान
महावीर स्वामी जैन धर्म के सबसे प्रसिद्ध तीर्थंकर हैं, जिन्हें अक्सर "जैन धर्म के संस्थापक" कह दिया जाता है, लेकिन जैन परंपरा उन्हें केवल अंतिम तीर्थंकर मानती है।
संक्षिप्त जीवन परिचय:
- जन्म: 599 ई.पू., वैशाली के निकट कुंडग्राम (बिहार)
- पिता: सिद्धार्थ (लिच्छवि गणराज्य के राजा)
- माता: त्रिशला
- 30 वर्ष की आयु में राज-पाट और परिवार छोड़कर संन्यास लिया।
- 12 वर्ष 6 महीने कठोर तपस्या के बाद केवलज्ञान प्राप्त किया।
- 42 वर्षों तक उपदेश देकर जैन धर्म के सिद्धांतों का प्रचार किया।
- 72 वर्ष की आयु में पावापुरी (बिहार) में निर्वाण प्राप्त किया।
महावीर के पंच महाव्रत:
- अहिंसा
- सत्य
- अचौर्य
- ब्रह्मचर्य
- अपरिग्रह
जैन धर्म का दर्शन
जैन दर्शन आत्मा और कर्म के सिद्धांत पर आधारित है।
- आत्मा शाश्वत है, लेकिन कर्मबंधन के कारण जन्म-मरण के चक्र में फँसी रहती है।
- कर्म सूक्ष्म भौतिक कण हैं, जो आत्मा से चिपक जाते हैं।
- मोक्ष पाने के लिए कर्मबंधन तोड़ना आवश्यक है, जो तपस्या, संयम और साधना से संभव है।
जैन दर्शन के प्रमुख सिद्धांत:
- अनेकांतवाद (सत्य के अनेक पहलू होते हैं)
- स्याद्वाद (सत्य सापेक्ष है)
- अहिंसा सर्वोपरि धर्म है।
प्रारंभिक विकास
महावीर के निर्वाण के बाद जैन धर्म दो प्रमुख संप्रदायों में बँट गया:
- दिगंबर – मुनि वस्त्र नहीं पहनते, कठोर तपस्या पर जोर।
- श्वेतांबर – मुनि सफेद वस्त्र पहनते हैं, साधना में लचीलापन।
दोनों में दर्शन एक है, पर जीवन-शैली और कुछ परंपराओं में भिन्नता है।
जैन धर्म का मध्यकालीन इतिहास
महावीर स्वामी के निर्वाण (527 ई.पू.) के बाद जैन धर्म का प्रसार तीव्र गति से हुआ।
- मगध, बिहार, झारखंड, बंगाल, उड़ीसा में प्रारंभिक केंद्र स्थापित हुए।
- समय के साथ यह गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु तक फैल गया।
मौर्य काल में जैन धर्म
- मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (322–298 ई.पू.) अपने जीवन के अंतिम समय में जैन धर्म में दीक्षित हुए।
- वे अपने गुरु भद्रबाहु के साथ कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में तपस्या करते हुए देह त्यागे।
- मौर्य शासनकाल में जैन धर्म को राजकीय संरक्षण मिला, जिससे मंदिर निर्माण और धर्म-प्रचार बढ़ा।
गुप्त काल में स्थिति
- गुप्त काल में हिंदू धर्म का पुनरुत्थान हुआ, लेकिन जैन धर्म भी गुजरात और राजस्थान में मजबूत बना रहा।
- इस समय जैन साहित्य और मूर्तिकला का विकास जारी रहा।
मध्यकालीन दक्षिण भारत
- दक्षिण भारत में जैन धर्म का स्वर्णयुग गंग, चालुक्य और होयसल राजवंशों के समय आया।
- श्रवणबेलगोला की गोमटेश्वर बहुबली प्रतिमा (57 फीट ऊँची) का निर्माण गंग वंश के दौरान (981 ई.) हुआ, जो विश्व की सबसे ऊँची अखंड पत्थर की मूर्तियों में से एक है।
जैन साहित्य का विकास
जैन धर्म के पास विश्व का एक विशाल साहित्यिक खजाना है, जिसमें धार्मिक, दार्शनिक, व्याकरण, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और इतिहास संबंधी रचनाएँ शामिल हैं।
आगम साहित्य
- श्वेतांबर परंपरा के अनुसार महावीर के उपदेशों को उनके शिष्यों ने "आगम" नामक ग्रंथों में संकलित किया।
- दिगंबर परंपरा मानती है कि मूल आगम लुप्त हो गए और बाद में आचार्यों ने प्रकृत व संस्कृत में नए ग्रंथ लिखे।
प्रमुख भाषाएँ
- अर्धमागधी – प्रारंभिक धार्मिक ग्रंथों की भाषा
- प्राकृत – लोकभाषा में रचनाएँ
- संस्कृत – दार्शनिक और शास्त्रीय ग्रंथ
- कन्नड़, तमिल, गुजराती, राजस्थानी – क्षेत्रीय भाषा साहित्य
महत्वपूर्ण आचार्य और कृतियाँ
- उमास्वामी (उमास्वाति) – तत्त्वार्थसूत्र (जैन दर्शन का मूल ग्रंथ)
- हर्षवर्धन के दरबारी कवि बाणभट्ट ने भी जैन साधुओं की प्रशंसा की।
- पद्मनंदी, कुंदकुंदाचार्य – दिगंबर साहित्य के महान नाम।
- हेमचंद्राचार्य – गुजरात के साहित्यिक व विद्वत् जगत के स्तंभ, जिन्होंने व्याकरण, छंदशास्त्र और इतिहास पर कार्य किया।
जैन कला और वास्तुकला
जैन धर्म ने भारत की वास्तुकला को अद्वितीय योगदान दिया है।
मंदिर निर्माण की विशेषताएँ
- सफेद संगमरमर का प्रयोग
- नक्काशीदार तोरणद्वार
- सूक्ष्म मूर्तिकला और प्रतीकात्मक चित्रण
- मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिरों का समूह
प्रसिद्ध जैन तीर्थ और वास्तुकला
- दिलवाड़ा मंदिर (माउंट आबू, राजस्थान) – संगमरमर की अद्भुत नक्काशी, 11वीं–13वीं सदी।
- पार्श्वनाथ मंदिर, खजुराहो – जैन मंदिरों का हिस्सा, सुंदर स्थापत्य शैली।
- श्रवणबेलगोला – गोमटेश्वर बहुबली की प्रतिमा।
- गिरनार पर्वत, पालीताना (गुजरात) – हजारों जैन मंदिरों का समूह।
जैन धर्म का समाज में योगदान
अहिंसा और शाकाहार
जैन धर्म ने भारत में अहिंसा और शुद्ध शाकाहार की परंपरा को लोकप्रिय बनाया।
जैनों की वजह से कई क्षेत्रों में मांसाहार पर सामाजिक और सांस्कृतिक रोक लगी।
शिक्षा और विद्या
- जैन आचार्यों ने शिक्षा को धर्म का हिस्सा माना।
- उन्होंने गुरुकुल और पुस्तकालयों का निर्माण किया।
- जैन व्यापारी समाज ने शिक्षा के प्रचार में आर्थिक योगदान दिया।
व्यापार और अर्थव्यवस्था
- जैन समाज व्यापार और बैंकिंग में अग्रणी रहा।
- उन्होंने ईमानदारी, भरोसा और न्याय के सिद्धांतों को व्यापार में लागू किया।
पर्यावरण संरक्षण
- जैन धर्म में वनस्पति और सूक्ष्म जीवों तक की रक्षा का सिद्धांत है।
- इससे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की परंपरा को बल मिला।
जैन धर्म का मध्यकालीन इतिहास
महावीर स्वामी के निर्वाण (527 ई.पू.) के बाद जैन धर्म का प्रसार तीव्र गति से हुआ।
- मगध, बिहार, झारखंड, बंगाल, उड़ीसा में प्रारंभिक केंद्र स्थापित हुए।
- समय के साथ यह गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु तक फैल गया।
मौर्य काल में जैन धर्म
- मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (322–298 ई.पू.) अपने जीवन के अंतिम समय में जैन धर्म में दीक्षित हुए।
- वे अपने गुरु भद्रबाहु के साथ कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में तपस्या करते हुए देह त्यागे।
- मौर्य शासनकाल में जैन धर्म को राजकीय संरक्षण मिला, जिससे मंदिर निर्माण और धर्म-प्रचार बढ़ा।
गुप्त काल में स्थिति
- गुप्त काल में हिंदू धर्म का पुनरुत्थान हुआ, लेकिन जैन धर्म भी गुजरात और राजस्थान में मजबूत बना रहा।
- इस समय जैन साहित्य और मूर्तिकला का विकास जारी रहा।
मध्यकालीन दक्षिण भारत
- दक्षिण भारत में जैन धर्म का स्वर्णयुग गंग, चालुक्य और होयसल राजवंशों के समय आया।
- श्रवणबेलगोला की गोमटेश्वर बहुबली प्रतिमा (57 फीट ऊँची) का निर्माण गंग वंश के दौरान (981 ई.) हुआ, जो विश्व की सबसे ऊँची अखंड पत्थर की मूर्तियों में से एक है।
जैन साहित्य का विकास
जैन धर्म के पास विश्व का एक विशाल साहित्यिक खजाना है, जिसमें धार्मिक, दार्शनिक, व्याकरण, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और इतिहास संबंधी रचनाएँ शामिल हैं।
आगम साहित्य
- श्वेतांबर परंपरा के अनुसार महावीर के उपदेशों को उनके शिष्यों ने "आगम" नामक ग्रंथों में संकलित किया।
- दिगंबर परंपरा मानती है कि मूल आगम लुप्त हो गए और बाद में आचार्यों ने प्रकृत व संस्कृत में नए ग्रंथ लिखे।
प्रमुख भाषाएँ
- अर्धमागधी – प्रारंभिक धार्मिक ग्रंथों की भाषा
- प्राकृत – लोकभाषा में रचनाएँ
- संस्कृत – दार्शनिक और शास्त्रीय ग्रंथ
- कन्नड़, तमिल, गुजराती, राजस्थानी – क्षेत्रीय भाषा साहित्य
महत्वपूर्ण आचार्य और कृतियाँ
- उमास्वामी (उमास्वाति) – तत्त्वार्थसूत्र (जैन दर्शन का मूल ग्रंथ)
- हर्षवर्धन के दरबारी कवि बाणभट्ट ने भी जैन साधुओं की प्रशंसा की।
- पद्मनंदी, कुंदकुंदाचार्य – दिगंबर साहित्य के महान नाम।
- हेमचंद्राचार्य – गुजरात के साहित्यिक व विद्वत् जगत के स्तंभ, जिन्होंने व्याकरण, छंदशास्त्र और इतिहास पर कार्य किया।
जैन कला और वास्तुकला
जैन धर्म ने भारत की वास्तुकला को अद्वितीय योगदान दिया है।
मंदिर निर्माण की विशेषताएँ
- सफेद संगमरमर का प्रयोग
- नक्काशीदार तोरणद्वार
- सूक्ष्म मूर्तिकला और प्रतीकात्मक चित्रण
- मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिरों का समूह
प्रसिद्ध जैन तीर्थ और वास्तुकला
- दिलवाड़ा मंदिर (माउंट आबू, राजस्थान) – संगमरमर की अद्भुत नक्काशी, 11वीं–13वीं सदी।
- पार्श्वनाथ मंदिर, खजुराहो – जैन मंदिरों का हिस्सा, सुंदर स्थापत्य शैली।
- श्रवणबेलगोला – गोमटेश्वर बहुबली की प्रतिमा।
- गिरनार पर्वत, पालीताना (गुजरात) – हजारों जैन मंदिरों का समूह।
जैन धर्म का समाज में योगदान
अहिंसा और शाकाहार
जैन धर्म ने भारत में अहिंसा और शुद्ध शाकाहार की परंपरा को लोकप्रिय बनाया।
जैनों की वजह से कई क्षेत्रों में मांसाहार पर सामाजिक और सांस्कृतिक रोक लगी।
शिक्षा और विद्या
- जैन आचार्यों ने शिक्षा को धर्म का हिस्सा माना।
- उन्होंने गुरुकुल और पुस्तकालयों का निर्माण किया।
- जैन व्यापारी समाज ने शिक्षा के प्रचार में आर्थिक योगदान दिया।
व्यापार और अर्थव्यवस्था
- जैन समाज व्यापार और बैंकिंग में अग्रणी रहा।
- उन्होंने ईमानदारी, भरोसा और न्याय के सिद्धांतों को व्यापार में लागू किया।
पर्यावरण संरक्षण
- जैन धर्म में वनस्पति और सूक्ष्म जीवों तक की रक्षा का सिद्धांत है।
- इससे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की परंपरा को बल मिला।
जैन धर्म का आधुनिक काल में विकास
औपनिवेशिक काल में स्थिति
ब्रिटिश शासनकाल में जैन धर्म का प्रभाव मुख्य रूप से पश्चिमी और दक्षिणी भारत में बना रहा।
- जैन व्यापारी समुदाय (खासकर गुजरात और राजस्थान) ने देश-विदेश में व्यापारिक नेटवर्क स्थापित किए।
- कई जैन परिवार बर्मा, श्रीलंका, पूर्वी अफ्रीका और इंग्लैंड तक पहुँचे।
- ब्रिटिश काल में जैन मंदिरों के जीर्णोद्धार और नए निर्माण कार्य तेज़ी से हुए।
सुधार आंदोलन
19वीं–20वीं शताब्दी में जैन समाज में सुधारवादी आंदोलनों का आरंभ हुआ।
- अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव और दिखावटी खर्च पर रोक लगाने के प्रयास हुए।
- शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सेवा पर जोर दिया गया।
- विजय वल्लभ सूरीश्वरजी जैसे संतों ने जैन धर्म के पुनर्जागरण में भूमिका निभाई।
जैन धर्म का विश्व में प्रसार
जैन धर्म की शिक्षाओं ने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभाव डाला है।
प्राचीन काल में विदेशों में प्रसार
- व्यापारिक मार्गों के माध्यम से जैन धर्म के अनुयायी मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और श्रीलंका तक पहुँचे।
- कुछ ऐतिहासिक प्रमाण बर्मा, कंबोडिया और इंडोनेशिया में जैन प्रभाव की ओर संकेत करते हैं।
आधुनिक काल में प्रवासी जैन समुदाय
आज जैन समुदाय अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, केन्या, तंजानिया, युगांडा और सिंगापुर जैसे देशों में सक्रिय है।
- वहाँ जैन मंदिर, सांस्कृतिक केंद्र और शाकाहार प्रचार संस्थाएँ स्थापित हैं।
- जैन धर्म के पर्यावरणीय सिद्धांतों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सराहा गया है।
जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांतों का आधुनिक महत्त्व
अहिंसा और वैश्विक शांति
आज के हिंसा-प्रवण समय में जैन अहिंसा सिद्धांत विश्व शांति के लिए एक आदर्श मॉडल है।
-
महात्मा गांधी ने भी अपने जीवन में अहिंसा का सिद्धांत जैन संतों से प्रेरित होकर अपनाया।
पर्यावरण संरक्षण
जैन धर्म के अपरिग्रह और जीव-दया सिद्धांत जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट के दौर में अत्यंत प्रासंगिक हैं।
शाकाहार और वीगनिज़्म
दुनिया भर में बढ़ते शाकाहारी और वीगन आंदोलन जैन धर्म की विचारधारा के अनुरूप हैं।
वर्तमान समय में जैन धर्म
जनसंख्या और भौगोलिक वितरण
भारत की जनगणना (2011) के अनुसार जैनों की संख्या लगभग 45 लाख है, जो कुल जनसंख्या का 0.37% है।
- प्रमुख राज्य: महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, दिल्ली।
- विदेशों में: अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी अफ्रीका।
संस्थाएँ और संगठन
- जैन विश्व भारती संस्थान – लाडनूं, राजस्थान
- श्री जैन श्वेतांबर सम्मेलन, भारतीय दिगंबर जैन महासभा
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर Federation of Jain Associations in North America (JAINA)
चुनौतियाँ
- युवा पीढ़ी में धार्मिक रुचि में कमी – आधुनिक जीवनशैली और तकनीकी बदलाव के कारण परंपरागत साधना से दूरी।
- सांस्कृतिक एकरूपता का खतरा – वैश्वीकरण के चलते स्थानीय जैन परंपराओं का लुप्त होना।
- संप्रदायिक विभाजन – दिगंबर और श्वेतांबर मतभेद अभी भी कुछ क्षेत्रों में बने हुए हैं।
- संख्या में कमी – जनसंख्या वृद्धि दर अन्य समुदायों से कम।
जैन धर्म की भविष्य की संभावनाएँ
- डिजिटल प्रचार – सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से जैन दर्शन का वैश्विक प्रचार।
- पर्यावरण और शाकाहार आंदोलन में नेतृत्व – वैश्विक पर्यावरण नीतियों में सक्रिय भागीदारी।
- अंतरधार्मिक संवाद – अहिंसा और अनेकांतवाद के माध्यम से धर्मों के बीच शांति और समझ बढ़ाना।
निष्कर्ष
जैन धर्म की यात्रा — ऋषभदेव से लेकर महावीर और फिर आज के वैश्विक जैन समुदाय तक — केवल एक धार्मिक गाथा नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की कहानी है।
- यह धर्म हमें सिखाता है कि सत्य एक ही नहीं होता, बल्कि उसके कई पहलू हो सकते हैं।
- यह बताता है कि अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा से बचना नहीं, बल्कि वाणी और विचारों में भी दया और करुणा रखना है।
- यह चेतावनी देता है कि अत्यधिक भोग और भौतिक संपत्ति का संग्रह अंततः आत्मा को बंधन में डाल देता है।
आज के समय में जब दुनिया हिंसा, असहिष्णुता और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, जैन धर्म के सिद्धांत पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।
अगर हम इन सिद्धांतों को अपने जीवन में उतार लें, तो न केवल व्यक्तिगत शांति, बल्कि सामाजिक और वैश्विक समरसता भी संभव है।
Follow Us