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Vakataka Dynasty (वाकाटक राजवंश) |
वाकाटक राजवंश : इतिहास, उद्भव और पृष्ठभूमि
उद्भव और स्थापना
वाकाटक राजवंश का उद्भव सातवाहन
साम्राज्य के पतन के बाद हुआ। जब सातवाहन सत्ता कमजोर हुई, तो विदर्भ और आस-पास के क्षेत्रों में नई
शक्तियाँ उभरने लगीं। इन्हीं में से एक शक्ति थी वाकाटक राजवंश, जिसके संस्थापक विंध्यशक्ति माने जाते हैं।
- विंध्यशक्ति का शासन काल लगभग 250
ईस्वी के आसपास माना जाता है।
- उनके नाम से प्रतीत होता है कि वे विंध्याचल क्षेत्र के शक्ति-उपासक रहे होंगे।
- प्रारंभिक राजधानी नंदिवर्धन (वर्तमान नागपुर के समीप) थी।
भौगोलिक स्थिति
वाकाटक साम्राज्य का विस्तार विदर्भ, महाकौशल, बुंदेलखंड, तेलंगाना
और उत्तरी आंध्र प्रदेश तक फैला था।
- उत्तर में नर्मदा नदी तक,
- दक्षिण में कृष्णा नदी तक,
- पश्चिम में मालवा और कोंकण क्षेत्र,
- पूर्व में उड़ीसा की सीमा तक उनका प्रभाव
था।
राजधानी समय-समय पर बदलती रही —
नंदिवर्धन और वासिम (वर्धन) प्रमुख केंद्र रहे।
गुप्त साम्राज्य से संबंध
शाखाओं में विभाजन
वाकाटक साम्राज्य समय के साथ दो
प्रमुख शाखाओं में बँट गया —
1. नंदिवर्धन शाखा (विदर्भ केंद्रित) — गुप्त साम्राज्य के साथ अधिक घनिष्ठ संबंध।
2. वासिम शाखा (बरार क्षेत्र) — दक्षिण भारत के राज्यों के साथ अधिक संपर्क।
दोनों शाखाओं ने स्वतंत्र रूप से
अपने-अपने क्षेत्रों में शासन किया, लेकिन सांस्कृतिक धारा समान रही।
ऐतिहासिक स्रोत
वाकाटक इतिहास के पुनर्निर्माण के
लिए मुख्य स्रोत हैं —
- शिलालेख — अजंता, मांडल, अमरावती और वर्धा क्षेत्र के अभिलेख।
- साहित्यिक प्रमाण —
पुराण, कालिदास के ग्रंथ, बाणभट्ट के वर्णन।
- पुरातात्विक अवशेष —
अजंता की गुफाएँ (विशेष रूप से
गुफा संख्या 16 और
17) जिनमें
वाकाटक काल की अद्वितीय चित्रकला और वास्तुकला दृष्टिगोचर होती है।
वाकाटक राजवंश : प्रमुख शासक, कालक्रम और उपलब्धियाँ
कालक्रम और प्रमुख शासक
वाकाटक राजवंश की राजनीतिक शक्ति का
उत्थान और विस्तार उनके सक्षम शासकों के कारण हुआ। नीचे प्रमुख शासकों का क्रम
दिया गया है —
विंध्यशक्ति (Vindhyashakti) – संस्थापक
- शासन काल : लगभग 250
ईस्वी – 270 ईस्वी
- इनके बारे में प्रत्यक्ष अभिलेख सीमित हैं, लेकिन पुराणों में इनके राज्य का उल्लेख
मिलता है।
- इन्हीं के नाम से वंश की पहचान “वाकाटक” के
रूप में हुई।
- विदर्भ क्षेत्र पर प्रभुत्व स्थापित किया।
- राजधानी — नंदिवर्धन।
प्रभाकरसेन
प्रथम (Pravarasena I)
- शासन काल : 270 ईस्वी – 330 ईस्वी
- वाकाटक राजवंश के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक।
- उन्होंने “सम्राट” की उपाधि धारण की, जो गुप्त सम्राटों के समान थी।
- चार अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ और अग्निष्टोम यज्ञ संपन्न
करवाए।
- राज्य का विस्तार नर्मदा से लेकर दक्षिण में
कृष्णा नदी तक किया।
- इनके शासन में वाकाटक साम्राज्य का स्वर्ण युग माना जाता है।
- मृत्यु के बाद साम्राज्य दो शाखाओं — नंदिवर्धन शाखा और वासिम शाखा —
में बँट गया।
शाखाओं के प्रमुख शासक
A. नंदिवर्धन
शाखा (विदर्भ केंद्र)
रुद्रसेन द्वितीय (Rudrasena II)
- शासन काल : 380 ईस्वी – 385 ईस्वी
- गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्ता से विवाह किया।
- गुप्त साम्राज्य से घनिष्ठ संबंध स्थापित
हुए।
- इनके निधन के बाद प्रभावती गुप्ता ने अपने नाबालिग पुत्रों की ओर से लगभग 20 वर्षों तक शासन किया।
प्रभाकरसेन
द्वितीय (Pravarasena II)
- शासन काल : 410 ईस्वी – 440 ईस्वी
- संस्कृत साहित्यकार, जिन्होंने सेतुबन्ध नामक महाकाव्य लिखा।
- राजधानी को नंदिवर्धन से प्रवरपुर (संभवतः पौनार के पास) स्थानांतरित किया।
- अजंता की कई गुफाओं के निर्माण में संरक्षण
दिया।
वासिम
शाखा (बरार क्षेत्र)
सार्वभौम
(Sarvasena)
- प्रसिद्ध कवि, जिन्होंने हर्षचरित जैसे संस्कृत ग्रंथ लिखे।
- दक्षिण में पल्लव और चालुक्य शक्तियों से
संपर्क बढ़ाया।
हर्षसेन
(Harishena)
- शासन काल : 460 ईस्वी – 490 ईस्वी
- कला और वास्तुकला के महान संरक्षक।
- अजंता की प्रसिद्ध गुफाओं (गुफा संख्या 16 और 17) के निर्माण का श्रेय इन्हें दिया जाता है।
- इनके शासन में साम्राज्य का सांस्कृतिक
उत्कर्ष चरम पर था।
राजनीतिक और सैन्य उपलब्धियाँ
1. विस्तार नीति — नर्मदा घाटी से लेकर कृष्णा नदी तक साम्राज्य का
विस्तार।
2. गुप्त साम्राज्य से गठबंधन — वैवाहिक संबंधों के माध्यम से राजनीतिक स्थिरता
प्राप्त की।
3. दक्षिण भारत में प्रभाव — पल्लव, चालुक्य और अन्य दक्षिणी शक्तियों से संपर्क।
4. धार्मिक संरक्षण — वैदिक यज्ञ, वैष्णव और बौद्ध कला का समर्थन।
सांस्कृतिक योगदान
- अजंता की भित्तिचित्र कला, जिसमें बौद्ध जातक कथाओं का अद्भुत चित्रण
है।
- संस्कृत साहित्य को संरक्षण — कवि सार्वभौम
और प्रभाकरसेन द्वितीय का योगदान।
- धर्म और कला का अद्वितीय संगम।
वाकाटक राजवंश : प्रशासन, समाज, धर्म, कला और
पतन
प्रशासनिक
व्यवस्था
राजसत्ता
- वाकाटक राजाओं के पास पूर्ण राजकीय अधिकार
थे।
- राजा को धर्मराज और सम्राट की उपाधि दी जाती थी।
- शासन वंशानुगत था और ज्येष्ठ पुत्र को
उत्तराधिकारी माना जाता था।
राज्य का विभाजन
- साम्राज्य को देश (प्रदेश) में विभाजित किया गया था।
- प्रत्येक देश के अंतर्गत कई विशय (जिले) आते थे।
- जिले के प्रमुख को विशयपति कहा जाता था।
- ग्राम प्रशासन ग्रामिक (ग्राम प्रधान)
द्वारा संभाला जाता था।
राजस्व व्यवस्था
- भूमि कर मुख्य आय का स्रोत था।
- कर की दर भूमि की उपज और सिंचाई की स्थिति
पर निर्भर थी।
- व्यापार और शिल्प पर भी कर वसूला जाता था।
सैन्य व्यवस्था
- सेना में पैदल, अश्वारोही और रथों के साथ-साथ हाथियों का भी
उपयोग होता था।
- गुप्तों की तरह ध्वजवाहक, अग्रणी सैनिक और विशिष्ट अंगरक्षक दल भी होते थे।
समाज
वर्ण व्यवस्था
- समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण थे।
- ब्राह्मणों को भूमि दान और विशेषाधिकार दिए
जाते थे।
स्त्रियों की स्थिति
- राजपरिवार की स्त्रियाँ (जैसे प्रभावती
गुप्ता) राजनीतिक शक्ति संभाल सकती थीं।
- उच्च वर्ग की स्त्रियों को शिक्षा और
धार्मिक कर्मों में भाग लेने का अवसर मिलता था।
ग्रामीण जीवन
- गाँव आत्मनिर्भर थे — कृषि, पशुपालन, बुनाई, मृदभांड निर्माण आदि प्रमुख व्यवसाय।
धर्म
- वाकाटक शासक वैदिक धर्म के अनुयायी थे, परंतु बौद्ध धर्म को भी संरक्षण देते थे।
- प्रभाकरसेन प्रथम ने वैष्णव धर्म अपनाया और
वैदिक यज्ञ करवाए।
- हर्षसेन के काल में बौद्ध विहार और स्तूपों
का निर्माण हुआ।
- प्रभावती गुप्ता वैष्णव मत की अनुयायी थीं।
कला और
संस्कृति
अजंता गुफाएँ
- वाकाटक काल की कला का सर्वोत्तम उदाहरण अजंता की गुफाएँ हैं।
- गुफा संख्या 16 और 17 विशेष रूप से हर्षसेन के संरक्षण में बनीं।
- चित्रकला में बौद्ध जातक कथाओं, राजदरबार, उत्सव और प्रकृति का अद्भुत चित्रण।
- स्थापत्य में स्तंभयुक्त मंडप, तोरण द्वार और सुंदर मूर्तिकला।
साहित्य
- प्रभाकरसेन द्वितीय का सेतुबन्ध काव्य प्रसिद्ध है।
- सार्वभौम जैसे कवि संस्कृत साहित्य में
प्रसिद्ध हुए।
पतन के
कारण
वाकाटक साम्राज्य का पतन पाँचवीं
शताब्दी के अंत में हुआ। प्रमुख कारण —
1. उत्तरी गुप्त साम्राज्य का पतन — राजनीतिक सहयोग खत्म हो गया।
2. दक्षिण के चालुक्य और राष्ट्रकूट आक्रमण।
3. आंतरिक कलह — दोनों शाखाओं में एकता की कमी।
4. अत्यधिक धार्मिक और सांस्कृतिक खर्च, जिससे आर्थिक स्थिति कमजोर हुई।
5. प्रशासनिक नियंत्रण का कमजोर होना।
वाकाटक
राजवंश का महत्व
- गुप्त और दक्षिण भारतीय संस्कृतियों के बीच
संपर्क स्थापित करना।
- अजंता जैसी अमर कला धरोहर का संरक्षण।
- संस्कृत साहित्य और वैदिक परंपरा का
विस्तार।
- महिला शासन (प्रभावती गुप्ता) का ऐतिहासिक
उदाहरण।
Note:-
- वाकाटक राजवंश की स्थापना 255 ई. के लगभग विन्ध्यशक्ति नामक व्यक्ति ने की थी। इसके पूर्वज सातवाहनों के अधीन बरार (विद्भ) के स्थानीय शासक थे।
- विन्ध्यशक्ति के पश्चात उसका पुत्र प्रवरसेन प्रथम (275-335 ई.) शासक हुआ। वाकाटक वंश का वह अकेला ऐसा शासक था जिसने सम्राट की उपाधि धारण की थी। पुराणों से पता चलता है कि इसने चार अश्वमेध यज्ञ किया था ।
- प्रवरसेन के पश्चात वाकाटक साम्राज्य दो शाखाओ में विभक्त हो गया-प्रधान शाखा तथा बासीय (वरसगुल्म) शाखा। दोनों शाखाएँ समानान्तर रूप से शासन किया।
- प्रधान शाखा के प्रमुख राजा-रूद्रसेन प्रथम (335-360ई.), प्रभावती गुप्ता का संरक्षण काल (390-410), प्रवरसेन द्वितीय (41-440 ई.) नरेन्द्र सेन (440-460 ई.), पृथ्वीसेन द्वितीय (460-480 ई.)
- गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्ता का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय से किया वाकाटकों का राज्य गुप्त एवं शक राज्यों के बीच था। राज्यों पर विजय प्राप्त करने के लिए चन्द्रगुप्त-II ने इस संबंध को स्थापित किया था बिवाह के समय बाद रूद्रसेन द्वितीय की मृत्यु हो गई। चूँकि उसके दोनों पुत्र दिवाकर सेन एवं दमोदर सेन अवयस्क थे अतः प्रभावतीगुप्ता ने शासन संभाला। यह काल वाकाटक गुप्त संबंध का स्वर्णकाल रहा।
- प्रभावतीगुप्ता के संरक्षण काल के बाद उसका कनिष्ठ पुत्र दमोदर सेन प्रवरसेन द्वितीय के नाम से गह्दी पर बैठा।
बासीम शाखा के बाकाटक
- बासीम शाखा के प्रमुख राजा सर्वसेन, विन्ध्यशक्ति द्वितीय (350-400 ई.), प्रवरसेन द्वितीय (400-415ई.), हरिषेण (475-510ई.)
- हरिषेण बासीम शाखा का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था यह वाकाटक वंश का अंतिम शञात शासक है।
- वाकाटक वंश के राजा प्रवरसेन द्वितीय ने मराठी प्राकृतकाव्य सेतुबन्ध की रचना की तथा सर्वसेन ने हरिविजय नामक प्राकृत काव्य-प्रथ लिखा।
- संस्कृत की वैदरभी शैली का पूर्ण विकास वाकाटक नरेशों के दरबार में हुआ।
- कुछ विद्वानों का मत है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय के राजकवि कालिदास ने कुछ समय तक प्रवरसेन द्वितीय की राजसभा में निवास किया था। वहाँ उन्होंने उसके सेतुबन्धु का संशोधन किया तथा वैदर्भी शैली में अपना काव्य मेघदूत लिखा ।
- वाकाटक नरेश ब्राह्मण धर्मालम्बी थे वे शिव और विष्णु के अनन्य उपासक थे।
- वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन द्वितीय के सामन्त व्याध्रादेव ने नचना के मंदिर का निर्माण करवाया ।.
- अजन्ता का सोलहवा तथा सत्रहवों गुहा विहार और उन्नीसवें गुहा चैत्य का निर्माण वाकटकों के शासन काल में हुआ।
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